• सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में इलाज के बाद निजी क्लीनिक बुलाने और ₹1,500 फीस लेने का दावा; कुशवाहा मेडिकल से दवाइयां लिखने के भी आरोप, स्वास्थ्य विभाग की जांच पर टिकी नजर

द पब्लिकेट, इंदौर। बाणगंगा स्थित शहरी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। मरीजों के परिजनों का दावा है कि सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में उपचार के लिए पहुंचने वाले कुछ मरीजों को कथित तौर पर निजी क्लीनिक पर बुलाया जाता है और वहां इलाज के नाम पर ₹1,500 तक फीस ली जाती है। इसके अलावा डॉक्टर शेफाली ओझा द्वारा कुशवाहा मेडिकल से दवाइयां लिखे जाने का भी आरोप लगाया गया है।

परिजनों का कहना है कि जब मरीज सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में इलाज के लिए पहुंचता है और वहां स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हैं, तो उसे निजी क्लीनिक पर बुलाने की जरूरत क्यों पड़ रही है। यदि निजी क्लीनिक में मरीजों को बुलाकर फीस ली जा रही है, तो यह व्यवस्था किस आधार पर संचालित हो रही है, इसकी जांच होना जरूरी है।

सरकारी अस्पताल से निजी क्लीनिक तक कैसे पहुंच रहे मरीज?

मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में आने वाले मरीजों को निजी क्लीनिक की ओर भेजा जा रहा है? परिजनों द्वारा लगाए गए आरोपों की फिलहाल स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में आरोपों की सत्यता सामने लाने के लिए स्वास्थ्य विभाग की निष्पक्ष जांच जरूरी है।

मेडिकल स्टोर की भूमिका पर भी सवाल

डॉक्टर शेफाली ओझा द्वारा कथित रूप से कुशवाहा मेडिकल से दवाइयां लिखे जाने के आरोप भी सामने आए हैं। यदि जांच में यह आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि मरीजों को किसी विशेष मेडिकल स्टोर से दवाइयां लेने के लिए क्यों कहा गया और इसके पीछे किसी तरह का हित जुड़ा है या नहीं।

स्वास्थ्य विभाग से जांच की मांग

मामले को लेकर स्वास्थ्य विभाग से मांग की जा रही है कि पूरे प्रकरण की जांच कराई जाए। जांच में डॉक्टर, मेडिकल स्टोर और संबंधित निजी क्लीनिक की भूमिका को शामिल किया जाए। साथ ही यह भी पता लगाया जाए कि सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में आने वाले मरीजों को निजी क्लीनिक पर भेजने और उनसे फीस लेने के आरोपों में कितनी सच्चाई है।

यदि आरोप जांच में सही पाए जाते हैं, तो संबंधित जिम्मेदारों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं, यदि आरोप तथ्यहीन पाए जाते हैं तो विभाग को स्थिति स्पष्ट कर मरीजों और उनके परिजनों के बीच बने भ्रम को भी दूर करना चाहिए।

फिलहाल पूरे मामले में स्वास्थ्य विभाग की जांच अहम है, क्योंकि सवाल सीधे सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की पारदर्शिता और मरीजों के भरोसे से जुड़ा है।

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