द पब्लिकेट, धार। भोजशाला एक बार फिर आस्था, इतिहास और कानून के चौराहे पर खड़ी है। वर्षों पुराना यह विवाद अब मध्यप्रदेश हाई कोर्ट इंदौर खंडपीठ में नई तीव्रता के साथ गूंज रहा है, जहां हर तर्क सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि भावनाओं से भी जुड़ा हुआ है।
सुनवाई के दौरान एक पक्ष की ओर से अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने गहरी आस्था से जुड़ा तर्क रखते हुए कहा “जहां एक बार मंदिर स्थापित हो जाता है, वह स्थान सदैव मंदिर ही रहता है।” उन्होंने दावा किया कि भोजशाला मूल रूप से मां सरस्वती का मंदिर था और आज भी उसे उसी रूप में देखा जाना चाहिए।
कोर्ट में रखे गए तर्क केवल शब्द नहीं थे, बल्कि इतिहास की परतों से निकले प्रमाण भी साथ लाए। बताया गया कि ब्रिटिश म्यूजियम में संरक्षित वाग्देवी (सरस्वती) की प्रतिमा पर अंकित शिलालेख राजा भोज के काल की ओर संकेत करता है। वहीं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट में भी स्थल पर देवी-देवताओं की मूर्तियां, जटिल नक्काशी और हवन कुंड जैसे अवशेष मिलने का उल्लेख है जो इसे मंदिर होने की दिशा में इंगित करते हैं।
हालांकि, इस स्थल को लेकर दूसरा पक्ष इसे मस्जिद के रूप में मान्यता देने की मांग करता रहा है। इसी वजह से यह विवाद केवल एक इमारत का नहीं, बल्कि दो मान्यताओं और इतिहास की अलग-अलग व्याख्याओं का बन गया है।
वर्तमान में इस मामले से जुड़ी चार याचिकाएं और एक अपील कोर्ट में विचाराधीन हैं। हर सुनवाई के साथ यह मामला और संवेदनशील होता जा रहा है, क्योंकि इसमें केवल कानून नहीं, बल्कि लोगों की आस्था, पहचान और इतिहास जुड़ा हुआ है।

