द पब्लिकेट, मध्यप्रदेश। प्रदेश में सबसे पौष्टिक मानी जाने वाली मूंग की दाल अब लोगों की सेहत के लिए बड़ा खतरा बनती जा रही है। मध्य प्रदेश में करीब 9 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में मूंग की खेती हो रही है, जिसमें आधे से ज्यादा उत्पादन नर्मदापुरम संभाग से आता है। अधिक पैदावार और कम समय में फसल तैयार करने की होड़ में किसान मूंग की फसल पर बार-बार कीटनाशकों का छिड़काव कर रहे हैं। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तरीका न सिर्फ लोगों की सेहत बल्कि जमीन की उर्वरता के लिए भी बेहद घातक साबित हो सकता है।

जानकारी के मुताबिक किसान फसल को मात्र दो महीने में तैयार करने के लिए चार बार और कटाई से पहले महज 12 घंटे में फसल सुखाने के लिए एक बार तेज रासायनिक दवाओं का छिड़काव कर रहे हैं। इससे दाने का रंग हरा बना रहता है और हार्वेस्टर से कटाई भी आसान हो जाती है, लेकिन फसल में रसायनों का अवशेष बना रहता है।

किसान खुद नहीं खाते यह मूंग

चौंकाने वाली बात यह है कि कई किसान खुद स्वीकार कर रहे हैं कि वे जिस मूंग की खेती कर रहे हैं, उसे अपने घर में नहीं खाते। बीलाखेड़ी के किसान प्रफुल्लदास महंत का कहना है कि अच्छी पैदावार के लिए दवा डालना मजबूरी है। वहीं जुझारपुर के किसान विजयबाबू चौधरी और गुनौरा के किसान यज्ञदत्त गौर का कहना है कि यह मूंग जहरीली है, इसलिए वे इसका सेवन नहीं करते।

कृषि मंत्री भी मान रहे खतरा

कृषि मंत्री कमल पटेल ने माना कि अत्यधिक गर्मी के कारण किसानों ने इस बार ज्यादा कीटनाशकों का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि वे किसानों को जहरीली खेती छोड़ने का संकल्प दिला रहे हैं। उनका कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो मध्य प्रदेश में भी पंजाब जैसे हालात बन सकते हैं और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के मामले बढ़ सकते हैं।

वैज्ञानिकों की चेतावनी

नर्मदापुरम के कृषि सहायक संचालक सुनील कुमार धोटे का दावा है कि क्षेत्र के लगभग सभी किसान अत्यधिक कीटनाशकों का उपयोग कर रहे हैं। इससे मिट्टी के जैविक तत्व नष्ट हो रहे हैं और अगले 10 वर्षों में गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं। कृषि उपसंचालक जे.आर. हेडाऊ के अनुसार वैकल्पिक फसल के रूप में मूंग की खेती अच्छी पहल थी, लेकिन अपनाया गया तरीका बेहद खतरनाक साबित हो रहा है।

जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर के कृषि वैज्ञानिक डॉ. अमित कुमार शर्मा के मुताबिक कीटनाशकों का असर वर्षों तक मिट्टी में बना रहता है। इसके प्रभाव से पानी, पशुओं का चारा, दूध और अंततः मानव स्वास्थ्य प्रभावित होता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस तरह की खेती पर तत्काल रोक नहीं लगी तो लिवर, किडनी, रक्त संबंधी बीमारियों और कैंसर के मामलों में बढ़ोतरी हो सकती है।

कौन-कौन से रसायनों का हो रहा इस्तेमाल?

  • क्लोरेंट्रानिलीप्रोल (Chlorantraniliprole) और थायमेथोक्साम का लगभग हर 10 दिन में छिड़काव।
  • इल्ली, कीट और अन्य कीड़ों को मारने के लिए मिश्रित रसायनों का उपयोग।
  • पैराक्वाट का दो बार प्रयोग, जिसमें कटाई से पहले फसल सुखाने के लिए भी इसका इस्तेमाल शामिल है।

सबसे बड़ा सवाल

एक ओर सरकार प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावा देने की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर खेतों में खुलेआम अत्यधिक कीटनाशकों का इस्तेमाल जारी है। सवाल यह है कि जब किसान, वैज्ञानिक और स्वयं कृषि मंत्री इस खतरे को स्वीकार कर रहे हैं, तो आखिर इसे रोकने के लिए सख्त कार्रवाई कब होगी? जनता की थाली तक पहुंचने वाली मूंग सुरक्षित है या नहीं, इसका जवाब अब सरकार और संबंधित एजेंसियों को देना होगा।

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