– क्या आज के भारत में राजनीतिक आंदोलन सड़कों पर जन्म लेते हैं, या मोबाइल स्क्रीन पर?

द पब्लिकेट से अमन चौहान। कुछ वर्ष पहले तक किसी भी बड़े आंदोलन की पहचान उसके धरना-स्थल, संगठन और नेतृत्व से होती थी। आज स्थिति बदल चुकी है। एक वायरल पोस्ट, एक मीम, एक हैशटैग या एक इंस्टाग्राम अकाउंट कुछ ही दिनों में लाखों लोगों की राजनीतिक भावनाओं को प्रभावित कर सकता है। यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं है; यह लोकतंत्र की बदलती संस्कृति का संकेत है।

हाल ही में CJP (Cockroach Janta Party) का उभार इसी बदलाव का एक रोचक उदाहरण बनकर सामने आया। एक विवादित टिप्पणी के विरोध में शुरू हुआ डिजिटल अभियान कुछ ही दिनों में करोड़ों युवाओं तक पहुँच गया। यह अपने आप में एक महत्वपूर्ण घटना है। लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण वह प्रश्न है जो इस घटना ने खड़ा किया है—क्या भारत का युवा राजनीतिक रूप से अधिक जागरूक हो रहा है, या वह सोशल मीडिया द्वारा निर्मित राजनीतिक ट्रेंड्स का हिस्सा बनता जा रहा है?

CJP से बड़ा प्रश्न

सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि CJP इस लेख का विषय नहीं है। विषय है वह राजनीतिक वातावरण जिसमें कोई भी डिजिटल अभियान कुछ ही दिनों में जनआंदोलन जैसा स्वरूप प्राप्त कर सकता है।

भारत में बेरोज़गारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं के आरोप, युवाओं में बढ़ती निराशा और प्रतिनिधित्व की कमी जैसे मुद्दे वास्तविक हैं। इन्हें नकारा नहीं जा सकता। यही कारण है कि जब कोई मंच इन भावनाओं को भाषा देता है, तो लाखों युवा उससे जुड़ते हैं।

लेकिन लोकतंत्र में केवल यह प्रश्न पर्याप्त नहीं है कि लोग किसी आंदोलन से क्यों जुड़ रहे हैं। उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि वे किससे जुड़ रहे हैं, क्यों जुड़ रहे हैं और किस दिशा में जा रहे हैं।

डिजिटल राजनीतिक लामबंदी का नया युग

सोशल मीडिया ने राजनीति को लोकतांत्रिक भी बनाया है और जटिल भी।

पहले राजनीतिक प्रभाव के लिए संगठन, संसाधन और वर्षों की मेहनत की आवश्यकता होती थी। आज एक प्रभावशाली डिजिटल नैरेटिव कुछ ही घंटों में लाखों लोगों तक पहुँच सकता है।

यही डिजिटल राजनीतिक लामबंदी है।

इस मॉडल की सबसे बड़ी ताकत इसकी गति है। लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी यही है।

क्योंकि गति अक्सर गहराई की जगह ले लेती है।

• एक वायरल वीडियो भावनाएँ पैदा कर सकता है, लेकिन क्या वह पर्याप्त संदर्भ भी देता है? 

• एक ट्रेंड लाखों लोगों को जोड़ सकता है, लेकिन क्या वह उन्हें समस्या की जटिलता भी समझा सकता है? 

• एक लोकप्रिय चेहरा भीड़ को आकर्षित कर सकता है, लेकिन क्या वह जवाबदेही भी स्वीकार करता है?

यहीं से लोकतंत्र और एल्गोरिद्म के बीच का अंतर शुरू होता है।

एल्गोरिद्म किसे बढ़ावा देता है?

सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म सत्य, संतुलन या विवेक के आधार पर नहीं चलते। वे ध्यान (Attention) के आधार पर चलते हैं।

जो सामग्री अधिक भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है, वही अधिक लोगों तक पहुँचती है।

क्रोध, व्यंग्य, अपमान, भय और आशा—ये सभी एल्गोरिद्म के पसंदीदा ईंधन हैं।

इसलिए आज की राजनीति में अक्सर सबसे अधिक सुना जाने वाला व्यक्ति वह नहीं होता जिसके पास सबसे अच्छा समाधान हो, बल्कि वह होता है जो सबसे प्रभावशाली ढंग से लोगों की भावनाओं को व्यक्त कर सके।

यही कारण है कि डिजिटल दुनिया में लोकप्रियता और लोकतांत्रिक वैधता हमेशा एक जैसी चीज़ें नहीं होतीं। लाखों फ़ॉलोअर होना प्रभाव का संकेत हो सकता है, लेकिन यह अपने आप में उत्तरदायित्व का प्रमाण नहीं है।

क्या हम मुद्दे के साथ हैं या चेहरे के साथ?

भारतीय लोकतंत्र के सामने यह शायद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है। किसी भी आंदोलन का समर्थन करने से पहले हमें स्वयं से पूछना चाहिए:

• क्या हम किसी नीति का समर्थन कर रहे हैं या किसी व्यक्ति का?

• क्या हम किसी समाधान के साथ खड़े हैं या केवल किसी विरोध के साथ?

• क्या हम किसी विचारधारा को समझते हैं या केवल उसके प्रतिनिधि चेहरे को पहचानते हैं?

CJP के संदर्भ में भी यही प्रश्न प्रासंगिक है।

यदि कोई आंदोलन छात्रों, युवाओं और शिक्षा से जुड़े मुद्दों को उठाता है, तो यह स्वागतयोग्य है। लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन की वास्तविक परीक्षा तब शुरू होती है जब उससे पूछा जाए—

• आपका अंतिम लक्ष्य क्या है?

• आपकी जवाबदेही किसके प्रति है?

• आपके समाधान क्या हैं?

• आंदोलन के बाद क्या?

ये प्रश्न किसी एक संगठन के लिए नहीं, बल्कि हर आंदोलन के लिए आवश्यक हैं।

Gen Z: सबसे जागरूक पीढ़ी या सबसे प्रभावित पीढ़ी?

भारत की Gen Z को अक्सर सबसे अधिक राजनीतिक रूप से जागरूक पीढ़ी कहा जाता है। यह बात आंशिक रूप से सही भी है। इस पीढ़ी के पास जानकारी तक अभूतपूर्व पहुँच है। यह समाचार देखती है, बहसों में भाग लेती है और अपनी राय सार्वजनिक रूप से व्यक्त करती है।

• लेकिन जानकारी तक पहुँच और समझ—दोनों अलग बातें हैं।

• किसी मुद्दे पर प्रतिक्रिया देना आसान है। उसे गहराई से समझना कठिन है।

• एक पोस्ट शेयर करना आसान है। किसी नीति का अध्ययन करना कठिन है।

• किसी नेता को फॉलो करना आसान है। उसके दावों की जाँच करना कठिन है।

• यहीं पर डिजिटल नागरिकता और लोकतांत्रिक नागरिकता अलग हो जाती हैं।

• लोकतंत्र केवल समर्थन करने का अधिकार नहीं देता; वह प्रश्न पूछने की जिम्मेदारी भी देता है।

लोकतंत्र को अनुयायी नहीं, नागरिक चाहिए

किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान उसके समर्थकों की संख्या से नहीं होती। उसकी पहचान उसके नागरिकों की आलोचनात्मक सोच से होती है।

यदि युवा केवल उन लोगों पर प्रश्न उठाएँ जिनसे वे असहमत हैं, तो वह राजनीति है।

यदि युवा उन लोगों पर भी प्रश्न उठाएँ जिनसे वे सहमत हैं, तो वह लोकतांत्रिक परिपक्वता है।

यही वह अंतर है जो एक आंदोलन को भीड़ से अलग करता है।

हमें हर राजनीतिक मंच, हर डिजिटल अभियान और हर लोकप्रिय चेहरे से एक समान प्रश्न पूछने चाहिए—

• वह कौन है?

• उसका उद्देश्य क्या है?

• उसकी जवाबदेही क्या है?

• और उसके पास समाधान क्या है?

CJP सही है या गलत, यह इस लेख का विषय नहीं है। वास्तविक प्रश्न इससे कहीं बड़ा है।

जब कोई डिजिटल आंदोलन लाखों युवाओं को प्रभावित करता है, तब हमें केवल उस आंदोलन का नहीं, बल्कि अपनी नागरिक चेतना का भी मूल्यांकन करना चाहिए। भारत के युवाओं की पीड़ा वास्तविक है। उनकी आकांक्षाएँ वास्तविक हैं। उनकी निराशाएँ भी वास्तविक हैं। लेकिन यदि इन भावनाओं को दिशा देनी है, तो केवल वायरल पोस्ट और ट्रेंडिंग हैशटैग पर्याप्त नहीं होंगे।

लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति वह नहीं होता जिसके सबसे अधिक अनुयायी हों। सबसे महत्वपूर्ण नागरिक वह होता है जो सबसे कठिन प्रश्न पूछने का साहस रखता है। क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी आवश्यकता समर्थकों की नहीं, बल्कि प्रश्न पूछने वाले नागरिकों की होती है। और किसी भी आंदोलन की वास्तविक शक्ति उसके अनुयायियों की संख्या में नहीं, बल्कि उसके समर्थकों की स्वतंत्र सोच में निहित होती है।

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