द पब्लिकेट से अमन चौहान, इंदौर। इंदौर इस समय सिर्फ जल संकट का सामना नहीं कर रहा, बल्कि राजनीतिक नैरेटिव, प्रशासनिक तैयारी और नागरिक जिम्मेदारी तीनों के टकराव के बीच खड़ा दिखाई दे रहा है। शहर के कई हिस्सों में पानी की सप्लाई प्रभावित है, हजारों बोरवेल सूख चुके हैं और टैंकरों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वास्तव में समाधान खोजे जा रहे हैं या फिर संकट को राजनीतिक मंच में बदला जा रहा है?
हाल ही में कांग्रेस द्वारा किए गए विरोध प्रदर्शन ने इस बहस को और तेज कर दिया। प्रदर्शन में Water Sprinkler का उपयोग सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बन गया। जिस शहर में लोग पानी की कमी से जूझ रहे हों, वहां पानी बचाने के मुद्दे पर आयोजित प्रदर्शन में ही पानी उड़ता दिखाई दे, यह दृश्य स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े करता है। सोशल मीडिया पर लोगों ने इसे “प्रोटेस्ट कम और इवेंट मैनेजमेंट ज्यादा” बताया। राजनीतिक विरोध लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन जब प्रस्तुति मुद्दे से बड़ी दिखने लगे, तब जनता का संदेह भी बढ़ता है।
हालांकि इस पूरे संकट में सरकार और प्रशासन को पूरी तरह क्लीन चिट देना भी सही नहीं होगा। इंदौर तेजी से विस्तारित हुआ है। नई कॉलोनियां, कमर्शियल इंफ्रास्ट्रक्चर और लगातार बढ़ती आबादी ने शहर के संसाधनों पर भारी दबाव डाला है। सवाल यह है कि क्या Water Infrastructure उसी गति से मजबूत हुआ? Groundwater Recharge, Rainwater Harvesting और Alternate Water Planning पर जितनी गंभीरता होनी चाहिए थी, वह पर्याप्त नजर नहीं आती।
लेकिन दूसरी तरफ कुछ तथ्य ऐसे भी हैं जिन्हें राजनीतिक शोर में नजरअंदाज किया जा रहा है। महापौर ने मीडिया में स्पष्ट कहा कि नर्मदा का जलस्तर लगभग स्थिर है, लेकिन शहर की आबादी और पानी की खपत कई गुना बढ़ चुकी है। उन्होंने बताया कि करीब 4000 बोरवेल सूख चुके हैं। पिछले कुछ वर्षों में 28 नए Public Water Tanks शुरू किए गए, पिछले वर्ष 7 नए टैंक और जोड़े गए तथा लगातार जल आपूर्ति बनाए रखने के लिए सरकार से 50 करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता भी मांगी गई है। ऐसे में यह कहना कि “सरकार कुछ कर ही नहीं रही” पूरी तरह तथ्यात्मक तर्क नहीं माना जा सकता।
इसी बीच कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी का बयान राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया। उन्होंने दावा किया कि इंदौर का “90 प्रतिशत पानी contaminated” है। लेकिन इतने गंभीर दावे के बावजूद अब तक कोई विस्तृत सार्वजनिक रिपोर्ट सामने नहीं आई है। Sampling Methodology क्या थी, किन इलाकों से Sample लिए गए और Scientific Standards क्या थे, इन सवालों के जवाब फिलहाल सार्वजनिक नहीं हैं। ऐसे में रिपोर्ट सार्वजनिक होने से पहले इतना बड़ा दावा करना कई लोगों को Panic Narrative तैयार करने की कोशिश जैसा लगा।
सबसे गंभीर बात यह है कि ऐसे बयान केवल सरकार को नहीं घेरते, बल्कि पूरे इंदौर की छवि को राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावित करते हैं। भगीरथपुरा जैसी घटनाओं के बाद जल गुणवत्ता को लेकर चिंता पूरी तरह जायज है, लेकिन बिना पूर्ण डेटा सार्वजनिक किए भय का माहौल बनाना भी जिम्मेदार राजनीति नहीं माना जा सकता।
वास्तविकता यह है कि इंदौर का यह संकट किसी एक पार्टी की विफलता भर नहीं है। यह वर्षों से बढ़ते Urban Pressure, Groundwater Exploitation, अनियोजित विस्तार और नागरिक लापरवाही का संयुक्त परिणाम है। इंदौर ने मिलकर खुद को देश का सबसे स्वच्छ शहर बनाया था। अब चुनौती “Clean City” से आगे बढ़कर “Water Responsible City” बनने की है।

