चार महीने में कब्जा देने का भरोसा, हर माह 4.25 लाख के चेक भी बाउंस; मल्हारगंज पुलिस ने पिता-पुत्र और बेटी पर दर्ज किया केस

द पब्लिकेट, इंदौर। करोड़ों की संपत्ति का सौदा, दो करोड़ रुपए भुगतान करने का दावा, बेटी के नाम रजिस्ट्री और फिर उसी संपत्ति के लिए 1.55 करोड़ रुपए का एक और विक्रय अनुबंध। खरीदार को भुगतान पावती और आधिपत्य रसीद भी दी गई, लेकिन फैक्ट्री का कब्जा नहीं मिला। परिसर खाली करने के लिए हर महीने 4.25 लाख रुपए देने के नाम पर दिए गए चारों चेक भी बाउंस हो गए। अब इस पूरे मामले में मल्हारगंज पुलिस ने कारोबारी दीपक जैन की शिकायत पर लोकेश डाटा, उसके भाई रितेश डाटा और बेटी मानवी डाटा के खिलाफ धोखाधड़ी तथा अमानत में खयानत से संबंधित धाराओं में केस दर्ज किया है।

मामले में सबसे गंभीर आरोप फैक्ट्री की मशीनरी, स्टॉक और अन्य परिसंपत्तियों पर केनरा बैंक से 90 लाख रुपए का कर्ज लेने का है। शिकायतकर्ता का दावा है कि संपत्ति के सौदे की रकम चुकाने के बावजूद उन्हें न अंतिम रजिस्ट्री मिली, न फैक्ट्री का खाली कब्जा और न ही उनकी रकम वापस हुई। पुलिस अब संपत्ति के दस्तावेजों, भुगतान के रिकॉर्ड और दोनों बैंकों से जुड़े ऋण दस्तावेजों की जांच करेगी।

पहले 2.10 करोड़ का सौदा, फिर बेटी के नाम रजिस्ट्री

सूर्या इन्वेस्टमेंट के प्रोपराइटर दीपक जैन के मुताबिक, औद्योगिक भूखंड क्रमांक 34/ए, किला मैदान क्षेत्र स्थित जमीन, भवन और मशीनरी का सौदा लोकेश पिता ओमप्रकाश डाटा और रितेश पिता ओमप्रकाश डाटा, निवासी शर्मा एन्क्लेव, गिरधर नगर से हुआ था। दोनों ने रिश्तेदार अभिषेक गुप्ता के माध्यम से उनसे संपर्क किया था।

शिकायत के अनुसार, 15 मार्च 2025 को करीब 2.10 करोड़ रुपए का पंजीकृत अनुबंध किया गया। दीपक जैन का दावा है कि उन्होंने इसके एवज में दो करोड़ रुपए का भुगतान कर दिया था। इसके बाद लोकेश और रितेश ने अपने नाम पर बैंक लोन नहीं मिलने की बात कहते हुए संपत्ति लोकेश की बेटी मानवी डाटा के नाम कराने का प्रस्ताव रखा। भरोसा दिलाया गया कि मानवी के नाम से लोन लेकर रकम का हिसाब कर दिया जाएगा। इसी क्रम में 19 जून 2025 को संपत्ति की रजिस्ट्री मानवी के नाम करा दी गई।

1.55 करोड़ का दूसरा अनुबंध, चारों चेक हुए बाउंस

दीपक जैन का आरोप है कि 4 फरवरी 2026 को मानवी डाटा ने अपनी कंपनी मेसर्स सोल क्लेव फैशन की संपत्ति के संबंध में उनके पक्ष में 1.55 करोड़ रुपए का पंजीकृत विक्रय अनुबंध किया। शिकायतकर्ता ने अलग-अलग तारीखों पर आरटीजीएस, अन्य माध्यमों और नकद भुगतान किए जाने का उल्लेख किया है। उनका दावा है कि पूरी राशि मिलने के बाद भुगतान पावती और आधिपत्य रसीद भी दी गई।

हालांकि, फैक्ट्री में चल रहा काम समेटने, मशीनरी हटाने और परिसर खाली करने के लिए चार महीने का समय मांगा गया। इस अवधि के लिए हर महीने 4.25 लाख रुपए क्षतिपूर्ति देने का भरोसा देकर चार चेक दिए गए। आरोप है कि खाते में पर्याप्त राशि नहीं होने के कारण चारों चेक अनादरित हो गए। समय बीतने के बाद भी खरीदार को न संपत्ति की अंतिम रजिस्ट्री मिली और न ही फैक्ट्री का खाली कब्जा। शिकायतकर्ता का कहना है कि भुगतान की गई रकम भी वापस नहीं की गई।

फैक्ट्री की परिसंपत्तियों पर 90 लाख का कर्ज

मामले में बैंक ऋण को लेकर भी गंभीर सवाल उठे हैं। दीपक जैन के अनुसार, केनरा बैंक के 28 अक्टूबर 2025 के मंजूरी ज्ञापन के तहत 60 लाख रुपए की कार्यशील पूंजी सीमा और 30 लाख रुपए का टर्म लोन स्वीकृत कराया गया था। शिकायत में आरोप है कि फैक्ट्री की मशीनरी, स्टॉक और अन्य परिसंपत्तियों पर बैंक के पक्ष में प्रभार बनाया गया, जबकि शिकायतकर्ता संपत्ति सौदे के लिए बड़ी रकम चुका चुके थे।

शिकायतकर्ता ने संपत्ति पर सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया का पहले से ऋणभार होने की जानकारी नहीं दिए जाने का आरोप भी लगाया है। अब जांच में यह अहम होगा कि दोनों बैंकों के ऋण दस्तावेजों में संपत्ति और परिसंपत्तियों की क्या स्थिति दर्ज थी तथा सौदे के समय संबंधित पक्षों ने खरीदार को किन तथ्यों की जानकारी दी थी।

मानवी के बयान नहीं हुए दर्ज

मल्हारगंज थाने को दीपक जैन का शिकायत आवेदन 30 जुलाई 2026 को मिला था। जांच एसआई रविराज सिंह बैस को सौंपी गई। जांच के दौरान शिकायतकर्ता के अलावा गवाह अभिषेक गुप्ता और विनोद वामने के बयान दर्ज किए गए। लोकेश और रितेश डाटा के कथन भी लिए गए, जबकि पुलिस के अनुसार, बार-बार कहने के बावजूद मानवी डाटा के बयान दर्ज नहीं हो सके।

पुलिस ने उपलब्ध दस्तावेजों और बयानों के आधार पर वरिष्ठ अधिकारियों को जांच रिपोर्ट भेजी। इसके बाद तीनों के खिलाफ केस दर्ज किया गया। अब पुलिस भुगतान के बैंक रिकॉर्ड, पंजीकृत अनुबंध, संपत्ति के स्वामित्व संबंधी दस्तावेज, ऋण स्वीकृति के कागजात और बाउंस हुए चेक की जांच करेगी। विवेचना में यह पता लगाने का प्रयास होगा कि भुगतान के बाद भी अनुबंध की शर्तें पूरी क्यों नहीं हुईं और संपत्ति की मशीनरी व अन्य परिसंपत्तियों पर बैंक का प्रभार किन परिस्थितियों में बनाया गया।

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