द पब्लिकेट, इंदौर। तंत्र विद्या में वर्णित दस महाविद्या देवियों में से सातवीं देवी माँ धूमावती को “धुएँ वाली” के रूप में जाना जाता है, जो शून्यता, वैराग्य और हानि एवं पीड़ा की अपरिहार्य वास्तविकताओं का प्रतीक हैं। मुख्य रूप से इनकी साधना सिर्फ़ अविवाहित पुरुष और विधवा स्त्री ही करते है। सुहागिनें दूर से दर्शन कर सकती हैं, लेकिन घर में साधना या प्रतिमा की पूजा वर्जित मानी जाती है।
सप्तम (सांतवा) दिवस : माँ धूमावती अशुभता, दरिद्रता और परम विनाश (प्रलय) का प्रतिनिधित्व करती हैं और अहंकार को शून्यता का सामना करने के लिए विवश करके गहन आंतरिक ज्ञान और मुक्ति प्रदान करती हैं। इनकी साधना शत्रुओं पर विजय, निडरता और निश्चिंतता के लिए की जाती है। वहीं, उन्नत साधकों द्वारा माया से बचाव, वैराग्य और शत्रुओं को दूर करने के लिए पूजा की जाती है।
क्या भोग चढ़ाएं : माँ को उग्र रूप के कारण तीखा, नमकीन और भुना हुआ भोजन प्रिय है। भोग में मुख्य रूप से भजिया (पकोड़े), समोसा, कचौरी, नमक लगी सूखी रोटी, और उड़द दाल की खिचड़ी अर्पित की जाती है। माता को मीठा भोग नहीं लगाया जाता।
बेहतर जीवन के लिए उपाए : आज के दिन चोराहे पर भजिए का भोग चढ़ाने से संकटों से रक्षा एवं शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।

