द पब्लिकेट, इंदौर। पुलिस की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। पुलिस थाना एम.आई.जी. के आधा दर्जन से अधिक पुलिसकर्मी और अधिकारियों के खिलाफ जिला न्यायालय, इंदौर ने गंभीर धाराओं में जांच प्रारंभ कर दी है। मामला एक टीबी से पीड़ित युवक को झूठे एनडीपीएस केस में फंसाने, अवैध हिरासत, रिश्वतखोरी और साजिशन एफआईआर दर्ज करने से जुड़ा है।

क्या है पूरा मामला

पीड़िता राधिका सोनी, निवासी प्रकाशचन्द्र सेठी नगर, इंदौर ने आरोप लगाया कि उसके भाई अजय सोनी, जो गंभीर टीबी से ग्रस्त था और जिसका वजन मात्र 30 किलो रह गया था, को 15 नवंबर 2024 को दोपहर करीब 12:40 बजे पुलिस थाना एम.आई.जी. के पुलिसकर्मी बिना किसी एफआईआर के घर से जबरन उठा ले गए।

परिवार द्वारा अजय की गंभीर बीमारी, सरकारी टीबी अस्पताल से हालिया डिस्चार्ज और डॉक्टर की सलाह के बारे में बताने के बावजूद पुलिस नहीं मानी। आरोप है कि थाने में पहुंचने पर पुलिसकर्मी ने अजय को छोड़ने के बदले 40 हजार रुपये रिश्वत की मांग की। मजबूरी में परिवार 25 हजार रुपये ही दे सका, जिसके बाद केवल एक्टिवा वाहन छोड़ा गया, लेकिन अजय को दिनभर अवैध रूप से थाने में बंद रखा गया।

रात में रची गई झूठी गिरफ्तारी की कहानी

रिश्वत की पूरी रकम न मिलने पर पुलिस ने साजिश के तहत अजय को अन्य स्थान ले जाकर उसकी कमर पर बंदूक अड़ाकर वीडियो बनाया और रात 9:19 बजे सिंगापुर बिजनेस बिल्डिंग के पीछे, अयोध्यापुरी से 9.10 ग्राम ब्राउन शुगर के साथ पकड़ने की झूठी कहानी गढ़ दी। इसके बाद आरक्षक से लेकर सब-इंस्पेक्टर स्तर तक के 9 पुलिसकर्मी झूठे गवाह बनते हुए एफआईआर दर्ज कर दी गई।

सीसीटीवी फुटेज बना अहम सबूत

पीड़िता के अनुसार, अजय को दोपहर में घर से ले जाने की पूरी घटना कॉलोनी के सीसीटीवी कैमरों में कैद हो गई थी। यही नहीं, थाने की जनरल डायरी और रोजनामचे में अजय को दिनभर हिरासत में रखने का कोई उल्लेख नहीं किया गया।

जेल में मौत, फिर भी नहीं थमी प्रताड़ना

अजय को अगले दिन कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया गया। जेल में रहते हुए बीमारी और मानसिक आघात के चलते 12 दिसंबर 2024 को अजय की मौत हो गई। मौत की सूचना परिजन को केंद्रीय जेल के माध्यम से मिली। आरोप है कि एमवाय अस्पताल में भी पुलिसकर्मी प्रवीण ने पीड़िता के साथ मारपीट की और फरार हो गया।

पुलिस कमिश्नर कार्यालय पर भी उठे सवाल

पीड़िता ने 23 मई 2025 को पुलिस कमिश्नर, इंदौर को भारतीय न्याय संहिता की कई गंभीर धाराओं और एनडीपीएस एक्ट की धारा 58 के तहत शिकायत की थी, लेकिन आरोप है कि शिकायत को दबा दिया गया और कोई जांच शुरू नहीं हुई। इसके बाद पीड़िता ने अपने अधिवक्ताओं हाईकोर्ट एडवोकेट कृष्ण कुमार कुन्हारे और डॉ. रूपाली राठौर के माध्यम से जिला न्यायालय में मामला दायर किया।

कोर्ट ने माना प्रथम दृष्टया गंभीर मामला

जिला न्यायालय, इंदौर ने पीड़िता के कथन दर्ज करते हुए सीसीटीवी फुटेज, स्क्रीनशॉट और अन्य सबूतों को संज्ञान में लिया है। कोर्ट में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट और मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के ऐसे मामलों की नजीरें भी पेश की गईं, जिनमें पुलिस द्वारा झूठे एनडीपीएस केस गढ़ने पर कार्रवाई के आदेश दिए गए थे।

लोकायुक्त तक पहुंचा मामला

सूत्रों के अनुसार, लोकायुक्त पुलिस इंदौर ने भी राधिका सोनी के बयान और सबूत लेकर पूरी फाइल भोपाल कार्यालय भेज दी है। वहीं समाजसेवी विनोद बब्बू यादव ने कहा कि इस मामले ने सोशल पुलिसिंग की छवि को गहरी चोट पहुंचाई है और जनता का पुलिस से भरोसा डगमगाया है।

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